इस आत्मकथ्य के लेखक अंचल सिन्हा जेपी आंदोलन के उन हजारों - लाखों कार्यकर्ताओं में से एक हैं जो महीनों कांग्रेस की इमरजेंसी में जेल में रहे. बाद में श्री सिन्हा ने सीधी राजनीति में आने से परहेज किया और बैंक की नौकरी में आ गए. बैंक की नौकरी के साथ श्री सिन्हा लेखन के कार्य में जुटे रहे. इसके साथ उन्होंने सामाजिक कार्यों में अपनी सक्रियता बनाए रखी. पत्र पत्रिका में जाने की उनकी जोरदार ख्वाइश के बावजूद उन्होंने 30 साल से ज्यादा भारतीय बैंक में नौकरी की. बाद में थककर वी आर एस लेकर बैंक छोड़ा और कुछ अख़बारों में नौकरी की. पर दो साल बाद उन्हें लगा कि वह वहां की राजनीति में जम नहीं पाएंगे तो वहां से भी अलग हो गए. उसके बाद भटकते हुए उन्हें पूर्वी अफ्रीका के एक देश युगांडा के एक बैंक से बुलावा आया. कुछ लोगों ने ईदी अमीन के समय का युगांडा उन्हें याद दिलाया पर वह हिम्मत करके वहां चल दिए. बाद में वह वहीं यानी याको बैंक युगांडा लिमिटेड में कार्यकारी निदेशक बना दिए गए. करीब 12 साल वे अफ्रीका को जानते समझते रहे. इस बीच वे कैंसर जैसे रोग से भी पीड़ित रहे. पर डाक्टरों के लगातार सलाह के बावजूद उन्होंने कीमो थिरेपी नहीं कराई और जीवन को समय के भरोसे छोड़ दिया. 2021 में उन्होंने वहां से भी वी आर एस माँगा और अपने देश में वापस आ गए. फिलहाल स्वतंत्र लेखन की कोशिश कर रहे हैं....