अजय बचपन में अनाथ हो गया था और चाचा-चाची के साथ दुखी जीवन जी रहा था। एक दिन उसे घर से निकाल दिया गया। रोते हुए तालाब किनारे उसकी मुलाकात एक बाबा से हुई जिन्होंने उसे गुरु देवेंद्र जी के आश्रम भेजा। कठिन यात्रा में मित्तु और गजानंद उसके साथ हुए। तीनों मिलकर आश्रम पहुँचे। वहाँ अजय को प्यार मित्रता और नया परिवार मिला। आश्रम में उसे जीवन का नया अर्थ मिला और वह बहुत खुश हुआ।