सुधा अरोड़ा की कहानी 'अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी' में अन्नपूर्णा मंडल आत्महत्या का चुनाव करती है दो बच्चियों को जन्म देने के बाद । निश्चय ही चेतना एक भौतिक तत्त्व की मानसिक स्थिति होती है। नव प्रभाववादी चित्रकार मातिसे को कहना था कि वह चित्र बनाते समय एक नन्हें शिशु की मानसिक स्थिति में पहुँच जाता है। 'अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी' स्त्री-विमर्श की दुनिया में कदम रखते ही मातिसे हो जाती है। वह समूचा विश्व एक शिशु-बोध में परिवर्तित कर देती है। सुधा अरोड़ा की स्त्री अगर इतिहास के प्रति सचेत होती है तो अपने को सृष्टि के आदि में ही देखी है जब रीढ़हीन केंचुओं का पृथ्वी पर आविर्भाव हुआ होगा।<br>कहानी दो नन्हें भाई-बहनों के खेल से शुरू होती है। बारिश होती है तो दोनों बच्चे पूकुर के पास रेंगते केंचुओं पर नमक डाल-डाल कर उन्हें मारते हैं- 'बाबा तुम डाकघर से लौटते तो पूछते- तुम दोनों हत्यारों ने आज कितनों की हत्याएँ कीं? फिर मुझे पास बिठाकर प्यार से समझाते बाबला की नकल क्यों करती है रे! तू तो माँ अन्नपूर्णा है देवी स्वरूपा तुझे क्या जीव-जन्तुओं की हत्या करना शोभा देता है।'