शहरग़र्द - शहर की ग़र्द से शहर की ग़र्द में शह
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इस काव्य-संग्रह शहरगर्द -शहर की गर्द से की जड़ें मेरे जीवन के उस ग़र्द भरे रस्ते में हैं जिसे हम अक्सर 'छोटे शहरों की ज़िंदगी' कहते हैं। यह संग्रह न सिर्फ़ कविताओं का संकलन है बल्कि छोटे और बड़े शहरों में बिताए मेरे जीवन की उन अनुभूतियों संघर्षों तुलनाओं बदलावों और सूक्ष्म परतों का दस्तावेज़ है जिन्हें मैंने जिया है समझा है और शब्दों में ढालने की कोशिश की है। यह संग्रह असल में छोटे शहरों उनके अनूठेपन और उनमें में हो रहे बदलावों पर एक टिप्पणी है और शहरी परिवर्तन आधुनीकरण और छोटे शहरों की विशिष्ट पहचान को दर्शाने का एक प्रयास है।
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