हमारा दृष्टिकोण ही हमारे जीवन की दिशाधारा तय करता है। छोटी-छोटी घटनाओं में दृष्टिभिद से ही हमारे देखने के नजरिये में बहुत अंतर हो जाता है। हर व्यक्ति में गुण और अवगुण दोनों होते हैं लेकिन यदि हमारा चिंतन गुणों की ओर केन्द्रित रहे तो उसके फायदे के रूप में हमें शांति व प्रसन्नता का अनुभव होता है। इसके विपरीत निराशावादी और अवगुणवादी छिद्रानवेशी मनुष्य अपने चारों ओर अभावों और दोषों के दर्शन करते हैं जिसके कारण वे अपने जीवन में शांति एवं प्रसन्नता का अनुभव कर ही नहीं पाते। जो व्यक्ति अभाव को भाव विवाद को हर्श तथा दुख को सुख में बदलने की कला जानता है - उसी व्यक्ति का जीवन सार्थक एवं सफल है। वास्तव में सुख और दुःख दोनों ही सीमाहीन हैं यानी इनकी कोई सीमा नहीं है। ऐसी स्थिति में यदि हम स्वयं को घोर दुखी एवं अभागा समझने लगें तो हमें इसके नए-नए कारण मिलते ही जाते हैं। मनुष्य की यह एक सामान्य प्रवृति है कि वह स्वयं को दूसरे से अधिक दुखी समझता है। इस मनोवृति में सुधार करना चाहिये।