<b>About the Book</b> नब्बे के दशक को वो सबसे अच्छी तरह समझ सकता है जिसने उसे जिया है। आँखों की गुस्ताखियों और चिट्ठियों वाले प्यार की शिद्दत सिर्फ महसूस करी जा सकती है। प्यार का नाम हमेशा पाना नहीं होता पर प्यार का एहसास हमेशा कुछ दे कर जाता है। यादों के पिटारे को जब भी खोलो एहसास के बादल बिखर जाते हैं और फिर गीला कर देते हैं आँखों को। लेकिन कमबख्त दिल आँखों के जज़्बात नहीं समझता। वो तो हर पल दिल के संदूक में रखी यादों को ढूँढता रहता है। ये कहानी मेरे दिल का एक हिस्सा है कुछ सच कुछ कल्पना है पर बहुत खास है... <br> <br> <b>About the Author</b> अपराजिता एक बेटी एक माँ और एक प्रेमिका होने के साथ ही फौज और उससे जुड़े लोगों का साथ निभाते हुए फुर्सत के पलों में एक लेखिका का किरदार भी निभाती हैं। दिल के जज़्बातों को कागज़ पर कुछ सच और कुछ कल्पना के ताने बाने में बुनकर परोसती हैं। कई प्रतिष्ठित अखबारों और मैगज़ीनों में लिखने के बाद ये उसका दिल को छूता हुआ पहला प्रयास है। “कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं होता एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों“ इसी यकीन पर कायम होकर उनकी आने वाली कहानियों के ताने-बाने के लिए प्रयास जारी है बस आपका प्यार और साथ कायम रखिएगा।