स्वदेशी अर्थात अपने देश का। यह मात्र भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की वकालत करने वाला आर्थिक नारा ही नहीं है बल्कि अपनी परंपराओंमूल्योंविश्वास और ज्ञान-विज्ञान पर गर्वित होने उसे प्रोत्साहित करने वाला वैचारिक आंदोलन भी है। 20वीं शताब्दी में स्वदेशी ने ही भारतीयों को विदेशी दासता के खिलाफ संघर्ष करने का आत्मिक बल दिया था। ब्रिटिश शासन काल में ‘श्वेतजाति भार’ के विरुद्ध भारतीय ज्ञान धार्मिक-सांस्कृतिक मूल्यों की श्रेष्ठता को देश-विदेश में रखने वाले दयानंद सरस्वती स्वामी विवेकानंद और अरविंदो घोषरविंद्र नाथ टैगोर इसके आदि स्रोत थे। तब स्वदेशी की आवश्यकता को पहचानते हुए हिंदी भाषा के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस प्रसिद्ध पंक्ति को रचा