यह उपन्यास निषाद समाज के उन अमर प्रेरणा-स्रोतों की ज्वलंत गाथा है जिन्होंने अन्याय तिरस्कार और सामाजिक भेदभाव की दीवारों को अपने साहस त्याग और बलिदान से तोड़कर इतिहास में अमिट स्थान प्राप्त किया। निषादराज गुहा की प्रभु-निष्ठा एकलव्य की मौन तपस्या फूलन देवी की प्रतिशोधाग्नि और डॉ. संजय निषाद की राजनीतिक क्रांति-इन चारों की जीवनगाथाएं इस ग्रंथ में एक चेतना की मशाल बनकर जलती हैं। यह उपन्यास केवल ऐतिहासिक चरित्रों का वर्णन नहीं बल्कि सामाजिक न्याय अस्मिता और संघर्ष की एक सशक्त हुंकार है। यह चेतना का वह स्वर है जो वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को अपने अधिकार अपनी विरासत और अपनी शक्ति के प्रति जाग्रत करेगा।