रेत के सिरहाने महेंद्र चौधरी द्वारा रचित एक भावप्रधान कविता संग्रह है जिसमें बचपन की स्मृतियों से लेकर आत्मस्वर की खोज तक की यात्रा को छूने वाली कविताएं हैं। लेखक ने ''रेत'' ''धूप'' ''चिंगारी'' ''ख़ामोशी'' और ''ऊंचाई'' जैसे प्रतीकों के माध्यम से भावनाओं को सहज और गहरी भाषा में अभिव्यक्त किया है। हर कविता जीवन के किसी अनकहे पल की गूंज है - जो पाठकों को भीतर तक स्पर्श करती है। लेखक परिचय महेंद्र चौधरी राजस्थान के बालोतरा ज़िले के (बायतु) भोजासर गांव की उस मिट्टी से जुड़े हैं जहाँ भावनाएं धूल की तरह उड़ती हैं और रिश्तों की जड़ें रेत में भी गहरी होती हैं। बचपन से ही शब्दों से खेलने वाले महेंद्र ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी विद्यालय से प्राप्त की। वर्तमान में वे वर्धमान महावीर ओपन यूनिवर्सिटी (VMOU) से एम.ए. की पढ़ाई कर रहे हैं। रेत के सिरहाने उनका प्रथम कविता-संग्रह है - जो न सिर्फ उनकी लेखनी की शुरुआत है बल्कि उनके भीतर बहते अनुभवों का दस्तावेज़ भी है। उनकी कविताएं घर गाँव मां-बाप संघर्ष और स्मृतियों की गंध लिए पाठकों के सामने आती हैं। महेंद्र मानते हैं कि कविता केवल शब्दों का क्रम नहीं एक अहसास है - कभी नम आंखों से झांकती तो कभी चुपचाप सीने में धड़कती। उनके लेखन में नाटकीयता नहीं बल्कि एक सच्चाई है जो सीधे पाठक के मन में उतरती है।
Piracy-free
Assured Quality
Secure Transactions
Delivery Options
Please enter pincode to check delivery time.
*COD & Shipping Charges may apply on certain items.