हीर राँझा – हरयाणवी लोक रागणी संग्रह (पिंगल समीक्षा सहित)लेखक: आनन्द कुमार आशोधियायह संग्रह हरियाणवी लोक-संस्कृति की आत्मा को छंदों और सुरों में बाँधने का एक सशक्त प्रयास है। हीर–राँझा की अमर प्रेमगाथा को हरियाणवी रागणी शैली में प्रस्तुत करते हुए लेखक ने इसे केवल भावनात्मक कथा नहीं बल्कि एक शास्त्रीय और सांस्कृतिक दस्तावेज़ बना दिया है। रागणी जो हरियाणा की लोकध्वनि है यहाँ छंदशास्त्र की कसौटी पर परखी गई है—पिंगल समीक्षा सहित।पुस्तक की विशेषता यह है कि प्रत्येक रचना को छंद-विधान यति-विराम वर्ण-गणना और दोष-लक्षण की दृष्टि से विश्लेषित किया गया है। दोहा चौपाई रोला सोरठा दुकलिया जैसे छंदों का प्रयोग करते हुए लेखक ने भाव और शास्त्र का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया है। रचनाओं में श्रृंगार रस की कोमलता करुण रस की गहराई और वीर रस की गरिमा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।यह संग्रह केवल प्रेमकथा नहीं बल्कि सामाजिक चेतना सांस्कृतिक पुनर्जागरण और लोकध्वनि का शोधग्रंथ है। हीर की पीड़ा राँझा का वैराग्य सेहती की चतुराई और कैदू की कुटिलता—सब कुछ रागणियों के माध्यम से जीवंत हुआ है। अंतिम रचनाओं में हीर–राँझा को लोकदेवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है जो श्रद्धा और लोकविश्वास का प्रतीक है।लेखक श्री आनन्द कुमार आशोधिया—भारतीय वायुसेना के पूर्व वारंट अधिकारी हिंदी भाषा के संवर्धन हेतु सम्मानित और हरियाणवी लोक साहित्य के संरक्षक—ने इस संग्रह को साहित्यिक अनुशासन सांस्कृतिक संवेदना और डिजिटल युग की प्रस्तुति के साथ प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक शोधार्थियों लोकगायकों साहित्यप्रेमियों और सांस्कृतिक संरक्षकों के लिए एक अनिवार्य संदर्भ बन सकती है।यदि आप लोक-संस्कृति की गहराइयों में उतरना चाहते हैं और हरियाणवी रागणी की गरिमा को समझना चाहते हैं—तो यह संग्रह आपके लिए है।