रचनाकार अपनी रचनाओं में अत्र तत्र बिखरा होता है। अपने अनुभव को एक कल्पना के पंख देकर उड़ने भर का प्रयास करता है लेखक। अपने रोदन अपने हास्य - इन सब में अपने 'मैं' को सार्वभौमिक बना कर दुख पीड़ा और आनंद में एकत्व उत्पन्न करने का प्रयत्न करना किसी महत् कार्य को करने के समान है। काव्य भाव प्रधान ही होता है पर विचार की रोशनी उस में चार चाँद लगा देती है। पाठकों के सम्मुख अपने लेखन को रखा है उनके स्नेह को प्राप्त करने के लिए।मन के भाव जब अधिक बढ़ जाते हैं उनका भार सहना कठिन हो जाता है तो कविता प्रस्फुटित हो पड़ती है।लेखन बोल पड़ता है।सरल शब्दों के उपयोग का भरसक प्रयास किया है जिससे पाठक गण सरलता से काव्य को आत्मसात कर सकें।--हेमन्त
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