चाहे सल्तनते हो या बड़े कारखाने पीते खून और पसीना ही है और खाते है लोगों के दौलत और वक़्त को और बलि देते है इंसानियत और ज़िंदगियों की।अब सवाल ये उठता है की भला ये बेज़ान सल्तनते और कारखाने खून-पसीने दौलत वक़्त इंसानियत और ज़िंदगियों को आखिरकार ये निगलतें कैसे हैं तो इसका जवाब ये है की इनके बड़े-बड़े ओहदों पे बैठे इनके आकाओ के ख्वाहिशों और हवस का मुँह इतना बड़ा होता है की ये चाहे तो पूरी दुनिया को अपने नुकीली दांतों से चबा जाए और अपने इस हैवानियत को वो अपनी ख़ुदाई(बड़ाई) समझते है।अब यहाँ ये समझ नहीं आता कि क्या कोई खुदा शैतानीयत की ओर बढ़ चला है या फिर कोई शैतान ही खुद को खुदा बना डाला है