भारतीय साहित्य में माँ

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जन्मदात्री माता के प्रति जितना आदर जितनी श्रद्धा भारतीय-साहित्य में चित्रत हुई है उतनी अन्यत्र दुर्लभ है। यहाँ माता देवीवत् पूज्या है। उसकी ममता उसका त्याग-वात्सल्य-सेवाभाव... सबकुछ अनुपमेय है। वस्तुतः माता हाड़-मांस की पुतली नहीं बल्कि एक भावना है। ऐसी भावना जो उदार भाव से सबको अपनी ममता के अंक में भर लेती है। अपनी संतान के साथ-साथ अन्य की संतानों को भी वह अपनी ममता के अमृत सींच देती है। पिता का वात्सल्य अन्य लोगों की संतति के प्रति अधिक उदार नहीं होता किन्तु माता की ममता का आँचल किसी को भी अपनी छाँह सहज ही प्रदान कर देता है। भारतीय साहित्य में माता के विविध रूप अंकित हुए हैं। इन रूपों में उसकी सहृदयता और सार्थकता पग-पग पर प्रमाणित है। उसकी संज्ञा ही आदरास्पद है। नारी के सभी रूप रम्य हैं... पत्नी प्रेयसी पुत्री भगिनी आदि अन्य नारी रूपों में भी मानवीय सम्बन्धों की सुगन्ध समाहित है किन्तु उसका माता रूप उपर्युक्त सभी रूपों से आगे हैं... बेजोड़ है। उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। साहित्य के पृष्ठ उसकी महिमा से उज्ज्वल हैं और सामाजिक जीवन उसके तप-त्याग से संवर्द्धित है। वह सर्वथा आदरणीय सेवनीय और रक्षणीय है। उसका आशीष संतान के लिए अनुपम वरदान और अमोघ कवच है। उसकी प्राप्ति के लिए संतान को सतत सचेष्ट रहना चाहिए यही भारतीय-साहित्य और संस्कृति का शाश्वत संदेश है
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