<p> </p><p><strong>अभिमन्यु : कुचक्र का चक्रव्यूह - </strong></p><p>अभिमन्यु सिर्फ एक महत्वाकांक्षी नौजवान नहीं था-वह एक बेचैन आत्मा एक विद्रोही कवि और एक संवेदनशील कलाकार था जिसकी रचनाएँ किसी हथियार से कम नहीं थीं। उसकी आवाज़ में आग थी और शब्दों में वह सच्चाई जिसे समाज अक्सर अनसुना कर देता है। गली-नुक्कड़ों पर होने वाले उसके कविता पाठ और नुक्कड़ नाटक सिर्फ मनोरंजन नहीं थे; वे सवाल थे तंज थे और उस व्यवस्था पर करारा प्रहार थे जो आम आदमी की पुकार सुनना ही नहीं चाहती।</p><p>बचपन से ही अभिमन्यु ने महसूस किया था कि दुनिया को बदलने के लिए सिर्फ अच्छा इंसान होना काफी नहीं है। इसके लिए हिम्मत चाहिए-और उस हिम्मत को दिशा देने के लिए कला। यही कारण था कि वह मंच को अपनी ढाल और कलम को अपनी तलवार मानता था। उसका संघर्ष सिर्फ अपनी पहचान बनाने का नहीं था बल्कि समाज में फैले अंधेरों को रोशनी दिखाने का था। लेकिन उसकी महत्वाकांक्षाएँ घर की चारदीवारी में कैद रहने वाली नहीं थीं। उसका मन राजनीति के उस जटिल मैदान में उतरना चाहता था जहाँ आदर्श और वास्तविकता की लड़ाई आदिकाल से चलती आई है।</p><p>राजनीति की ओर बढ़ने का उसका निर्णय किसी लालच या स्वार्थ का परिणाम नहीं था; यह उसके भीतर पल रहे उस जज़्बे का फल था जो समाज को बेहतर बनाने का सपना देखता था। पर अभिमन्यु को यह कहाँ मालूम था कि राजनीति वो रास्ता नहीं जहाँ सिर्फ सपनों के सहारे चला जाए। यह वो जगह है जहाँ रोशनी भी अँधेरे का मुखौटा पहन लेती है और अच्छे इरादे भी अक्सर शक्ति की हवाओं में बिखर जाते हैं।</p><p>धीरे-धीरे अभिमन्यु ने वह सब हासिल किया जिसकी उसने कामना की थी सम्मान लोकप्रियता मंच और जनता की ताली। उसकी आवाज़ दूर तक गूँजने लगी थी। लेकिन उस गूँज के पीछे छिपी चालों की उसे कोई आहट नहीं मिली। उसे महसूस भी नहीं हुआ कि उसके हर
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