मरियम की उम्र सिर्फ़ पंद्रह साल होती है जब उसे रशीद से शादी करने के लिए काबुल भेजा जाता है। लगभग दो दशक बाद मरियम और एक स्थानीय किशोरी लैला के बीच दोस्ती बढ़ती है जो माँ और बेटी के बीच के रिश्ते जितनी ही मज़बूत होती है। जब मुल्क पर तालिबान का क़ब्ज़ा हो जाता है तो उनकी ज़िंदगी भुखमरी क्रूरता और डर के ख़िलाफ़ एक हताश संघर्ष में तब्दील हो जाती है फिर भी प्यार लोगों को अप्रत्याशित तरीक़े से काम करने और चौंकाने वाली बहादुरी के साथ सबसे कठिन बाधाओं को पार करने के लिए प्रेरित कर सकता है। ''अगर आप सोच रहे हैं कि क्या 'ए थाउज़ेंड स्प्लेंडिड सन्स' 'द काइट रनर' जितनी अच्छी है तो इसका जवाब है: नहीं। यह उससे भी बेहतर है'' - वाशिंगटन पोस्ट ''केवल सबसे सख़्त दिल वाला इंसान ही जज़्बाती होने से बच सकता है'' - ग्लैमर ''एक बेहतरीन कहानी... वे एक ऐसे कहानीकार हैं जिनकी कहानी कहने की शक्ति बहुत तेज़ है'' - इवनिंग स्टैंडर्ड ''हुसैनी के पास एक दुर्लभ चीज़ है कहानी कहने की डिकेंसियन कला'' - डेली टेलीग्राफ़ ''एक चित्ताकर्षक कहानी... यह तालिबान के शासन में महिलाओं की पीड़ा और उनकी मज़बूती का शक्तिशाली चित्रण भी है'' - डेली मेल
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