‘आधे सफ़र का हमसफ़र’ संग्रह की कहानियों को पढ़ते हुए अनायास ही मंटो यादे आते हैं। वहीं इन कहानियों की विषय-वस्तु बांग्ला लेखिका तसलीमा नसरीन का स्मरण कराती है। शायद इसीलिए इन कहानियों की कथाबद्धता और रवानगी विवाद और विद्रोह के चेहरे रहे इन लेखकों के लेखन की अगली कड़ी मालूम होती है। इन कहानियों में दंगों की विभीषिका नारी विमर्श और समलैंगिक संबंधों के साथ-साथ मदरसों और मस्जिदों में मज़हब के नाम पर होने वाले यौन शोषण और मौलानाओं के दुराचार जैसे विषयों को उठाया गया है। मगर इन वीभत्स और ख़तरनाक मुद्दों को उठाए जाने के बावजूद एक बात जो समझ नहीं आती वह यह कि आख़िर इस्लाम के झंडाबरदारों ने लेखक के ख़िलाफ़ अभी तक कोई एक्शन क्यों नहीं लिया क्यों उनके ख़िलाफ़ फतवे जारी नहीं हुए या फिर मुस्लिम समाज इतना परिपक्व हो गया कि वह तसलीमा और रुश्दी के विपरीत उन्हीं की श्रेणी के नए लेखकों को स्वीकार कर रहा है। जो भी हो शहादत की ये कहानियाँ एक रहस्यमय और पेंचीदे समाज की उन अंदरूनी डरावनी कथाओं को बाहर लाती हैं जिनसे साहित्य की दुनिया अभी तक अनजान रही है।
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