हर विषय के दो पक्ष हैं एक सूक्ष्म तो दूसरा स्थूल। सूक्ष्म स्थूल की शक्ति है। पुष्प स्थूल है तो इसकी सुगन्ध सूक्ष्म है। शरीर स्थूल है तो इसमें अवस्थित ब्रह्म सूक्ष्म है। शास्त्र प्रमेय रूप में स्थूल है पर ज्ञान शास्त्र का सूक्ष्म पक्ष है। सूक्ष्म पक्ष ही अध्यात्म है ये ही सकारात्मक परिवर्तन का कारक है। इस पक्ष को कोई संवेदनशील अभ्यासी ही अनुभव कर प्रसारित कर सकता है। विश्व में आध्यात्मिक लेखन बहुत हुआ है पर हृदय परिवर्तन करने वाला लेखन बहुत कम ही मिलता है क्योंकि इस क्षेत्र के लेखकों को प्रमेय बोध तो होता है परन्तु सूक्ष्म का ज्ञान और अभ्यास नहीं होता। मैंने श्रद्धेय श्री बल्देव भाई जी के लेखन की गहराई को जितना समझ पाया हूँ उसके आधार पर कहता हूँ कि उनका लेखन कागज़ का स्याही से सम्बन्ध नहीं है बल्कि अध्यात्म के एक अभ्यासी का अनुभव है जो शब्दों के सूक्ष्म (ब्रह्म रूप) से परिचित है और अनुभव बटोर बटोर कर थाली में सजाकर पाठकों को बड़े चाव से परोस रहा है। उनका विश्लेषण मस्तिष्क नहीं मन को छूता है और विचारों को शांत कर वृतियों को एकाग्र कर देता है। ऐसे श्री बल्देव जी की पुस्तक ज्ञान पिपासुओं के लिए गंगा समान सिद्ध होगी ऐसा मेरा परम विश्वास है। : श्री पवन जी महाराज (आध्यात्मिक गुरु एवं विचारक)