इस पुस्तक के आलेख विभिन्न विषयों पर केन्द्रित हैं यथा धार्मिकता पर्यटन पुरातत्व शैली राजनीति महान व्यक्तित्वों के बारे में विभिन्न पर्वों जनजाति के बारे में आदि आदि। दरअसल समाज में स्थापित-समाज को प्रभावित करने वाली हर विधा.....हर बात के मूल में यही है कि किस तरह समरसतावाद कायम रहे। समरसतावाद अर्थात प्रेम-सौहार्द सुख-शान्ति धर्म मानवता... और विकास। मनुष्य प्रारम्भ से ही अनवरत जिज्ञासु प्रवृत्ति का रहा है। इसी जिज्ञासु प्रवृत्ति का परिणाम हम आज विकास के विराट स्परूप के रूप में देखते हैं। जिज्ञासा ही मनुष्य को कुछ करने को प्रेरित करती है। जिज्ञासा के कारण ही समाज-राष्ट्र के प्रत्येक क्षेत्र में नये अध्ययन नये विचार नये आविष्कार नयी चेतना अनवरत हमारे सामने आती रहती है। इन सबका मूल समरसतावाद ही है। समरसतावाद यानि प्रकृति.....पहाड़.....झरने.....आसमान.....जंगल जो भी अहसास मनुष्य को मनुष्य बनने को प्रेरित करे वह है समरसतावाद।
Piracy-free
Assured Quality
Secure Transactions
Delivery Options
Please enter pincode to check delivery time.
*COD & Shipping Charges may apply on certain items.