कवितायें क्या कहती हैं! कविताओं में रचना के कालखण्ड से जुड़े व्यक्ति परिवार और समाज के साथ-साथ देश-दुनिया का दर्द परिलक्षित होता है। यह दर्द घात-प्रतिघात विश्वासघात और किसी मोर्चे पर हार का भी होता है। हाशिए पर खड़े आदमी की दुःस्थिति का चित्रण भी कविताओं की विषयवस्तु होती है जो देश-दुनिया और समाज से प्रश्न करती प्रतीत होती हैं। यहाँ अस्तित्व के जिन्दा रहने का संघर्ष भी कविताओं में ही उभरता है। ‘वाह’ और ‘आह’ दोनों का सम्मिश्रण कविताओं में उपजता है जो उस कालखण्ड की खुशी और दर्द दोनों की पूंजी होती है। कवितायें शब्दों के शब्द-जाल मात्र नहीं हैं। इनके अन्तर्गत निहित भावों का स्पदंन एक ओर जहाँ जन-जन तक पहुँचने में समर्थ होता है वहीं दूसरी ओर इनमें छुपा एकाकीपन आज के सामाजिक परिवेश को प्रतिबिम्बित करता है। इनके शब्दों के मध्य छुपा निःशब्द भाव पाठक के दिल को तार-तार कर अपनी पैठ बनाने में सफल होता है और व्यक्ति परिवार और समाज के समक्ष कई प्रश्न-चिन्ह खड़े कर जाता है। कविताओं के शब्दों के मध्य जो निःशब्द अभिव्यक्ति छुपी होती है उसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। हाँ शब्दों की आधारभूत संरचना पर खड़े होकर कभी-कभी चीख-चीखकर कभी रोकर कभी हँसकर और कभी खामोश रहकर ये अपनी अभिव्यक्ति देश-दुनिया और समाज तक पहुँचाते रहते हैं। व्यक्ति के अंदर सोये इंसानी नैतिकता संवेदनशीलता और दर्द को जगाने का काम कवितायें ही करती हैं। यही नहीं देश और समाज के लिए बहुत कुछ कर गुजरने को कवितायें ही प्रेरित करती हैं। कवितायें किसी भी संदर्भ में तोड़ने का काम नहीं करतीं। तोड़ने वाली पूर्वाग्रह से ग्रस्त दुर्भावनाओं को चित्रित कर जोड़ने की कला में इनकी भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होइस संदर्भ में देश और दुनिया के महान राष्ट्रकवियों की भूमिका को भला कौन भूल सकता है। जहाँ तक टूट का प्रश्न है भीतर से टूटी एक असहाय नारी का चित्रण कविता को न सिर्फ अनमोल बना देता है बल्कि उस नारी के उत्थान के सारे विकल्प भी उसी कविता में छुपे होते हैं। उल्लसित नारी का उल्लास किसी कविता में अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप में प्रस्तुत हो सकता है यदि कलम की ताकत शब्दों को साथ लेकर चले। कई महान कवियों का स्मरण हम इन्हीं संदर्भों में युगों-युगों से करते आये हैं। कवितायें ‘मैं’ को विस्तार देती हैं और ‘हमारा’ की भावना को असीमित करती हैं। ‘हमारा’ और ‘सबका’ को पुनर्परिभाषित कर उसका विवेकपूर्ण चित्रण किसी कविता की आत्मा होती है जबकि ‘परायेपन’ की भावना में निहित स्वार्थ की भावना का परित्याग कर उसे अपनत्व की अवधारणा में बदलकर कविता विवेकानुभूति से लबालब भर जाती है। कवितायें जीने के लिए नये आयामों का निर्माण करती हैं और जीवन जीने की कला को विस्तार देती हैं। इनमें ‘वाह’ भी होती है और ‘आह’ भी। दर्द की पोटली भी होती है और जिजीविषा का उपहार भी। जीत भी और हार भी। उतार भी चढ़ाव भी। राग भी द्वेष भी। स्नेह भी और विछोभ भी। उबाल भी और उतराव भी। तात्पर्य यह कि विभिन्न संदर्भों में अभिव्यक्त कवितायें समय के साथ अनमोल और अमर हो जाती हैं और सदा-सदा के लिए देश और समाज की धरोहर बन जाती हैं।विनोद कुमार लालbinodlal27@gmail.com