Aart Gaan
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आर्त-गान ‘वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान उमड़कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान!’ (सुमित्रा नंदन पंत) या ‘मा निषाद त्वं गम: प्रतिष्ठां शाश्वती समा: यत् क्रौंच मिथुनादेकं त्वं वधी: काम मोहितं !’ (महर्षि वाल्मीकि) चाहे तो आदि कवि वाल्मीकि हों चाहे फिर छायावादी कवि पंत हों एक बात तो तय है कि कविता वियोग या विषाद या शोक से उत्सृजित होती है। पहले-पहल की रचनाएँ हैं ये – जीवन के पहले-प्रहर की; अतः बच्चों के उपयुक्त ही हो सकती हैं। बाल-कविता! बाल-कविता इसे मैंने फिर भी इसलिए नहीं कहा क्योंकि इनमें मुझे कुछ सार भी सन्निहित लगता रहा है; एकदम तो बकवास नहीं ही हैं ये जैसी कि बाल (अबोध) -कविता की प्रकृति और प्रवृत्ति होती है। ये कविताएँ 1972 से 1976 के काल-खंड में सृजित हैं; लगभग अर्ध-शती की परिपक्व दृष्टि से समन्वित!
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