जिसे आज तक कोई नहीं जान पाया उसे हमने इस छोटी सी पुस्तक में समझने का प्रयास किया है। यद्यपि आत्मा भौतिक विज्ञान की तरह प्रमाणित नहीं है तब भी बिना कारण तो कोई कार्य होता नहीं। अब यदि आत्मा नहीं है तो वह कौन सा कारण है जिसके होने से यह सारा व्यष्टि जगत है और आगे भी रहेगा यदि आत्मा है तो उसका स्वरूप क्या है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए शास्त्र लिखे गए। तो भी सभी शास्त्रों का इस बारे में अपना-अपना मत है। इसका प्रमुख कारण यह है कि आत्मा ज्ञेय है ज्ञात नहीं और ज्ञात करने का कोई अन्य साधन भी नहीं है सिवाय अनुभूति के और अनुभूति प्रमाण का विषय है ही नहीं तथापि एक श्रुति मत का एवं अनुभूति द्वारा समझने का प्रयास करते हैं कि- तमीश्वराणां परमं महेश्वरं (श्वेताश्वतरोपनिषद्-६/७); तो परमं महेश्वरं कौन है और कैसे जानते हैं कि ऐसा भी कोई एक ईश्वर है केवल इसी एक की स्तुति करनी चाहिए। ‘‘भुवनेशमीड्यम्’’ से तो यही भाषित होता है (इड्यमिति स्तुति नामः)। इस मञ्त्र में “तं देवतानां परमं च दैवतम् और पतिं पतीनां परमं परस्तात् तथा विदाम” इन शब्दों का अर्थ करने पर (परस्तात्) सबसे परे और विदाम यानी हम जानते हैं। तो सबको दिखाई नहीं देता फिर ऐसे ईश्वर की जिसका कोई अस्तित्व किसी ने नहीं जाना और नहीं देखा। सो कैसे माना जाय कि एक सभी देवताओं का देवता और सभी पतियों का पति है जिसे जानते भी नहीं और जानते भी हैं सो उसके होने के पक्ष में पहला तर्क है कि जो स्वयं को ही ईश्वर मानता और कहता है कि “अहं ब्रह्मास्मि” तो उसके लिए तो कहने की आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन जो हमारी तरह के मूर्ख लोग हैं वे अंधविश्वास को नहीं मानते पर एक असीम और अनंत सत्ता में ही विद्यमान और समर्पित होते हैं।