कुमार अजय की यह डायरी शुरू से अंत तक एक कहानी की तरह चलती है। पाठक जैसे डायरी नहीं कहानी सुन रहा हो। स्वयं लेखक के मुँह से अपनी भी पर की भी। खास बात यह है कि लेखक उस दिन की डायरी का अंत भी अधिकांशतः कहानी की तरह ही करता है। 2 नवंबर 2019 को वे डायरी की शुरुआत में लिखते हैं ‘‘जैसे यह शहर पराली से भरा हुआ कोई ट्रक है’’ और अंत इस उम्मीद के साथ करते हैं ‘‘काश जिस तरह पराली का धुआँ दिल्ली तक पहुँचता है वैसे ही किसानों की समस्याएँ और लोगों के मुद्दे भी ठीक तरह से दिल्ली पहुँचें।’’ इसीलिए कुमार अजय की यह डायरी रोजनामचा भर नहीं है बल्कि इसमें कहीं गहरे तक विचार भी गुंथा हुआ है जो जीवन के सच से रूबरू अंकित होते चलता है।