उपन्यास 'अब नहीं' उत्तराखण्ड के पहाड़ों में बसे लोगों के कष्ट व पीड़ा को अपने आप में समेटे हुए है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद भी वहाँ के लोगों को जो मूलभूत सुविधाएँ मिलनी चाहिए थीं वे अभी तक नहीं मिली। वहाँ न अस्पताल हैं और न ही लैब। अगर कहीं कोई अस्पताल है भी तो उसमें सुविधाएँ न के बराबर हैं। बीमारी की हालत में उन्हें काशीपुर या फिर दिल्ली आना पड़ता है। बस पकड़ने के लिए घंटों पैदल चलना पड़ता है।<br>वहाँ के अधिकांश लोगों को टी.बी. व कैंसर जैसी भंयकर बीमारियों के बारे में खास जानकारी नहीं है। शराब वहाँ के लोगों के लिए धीरे-धीरे मुख्य पेय बनता जा रहा है। जिसके कारण वहाँ की युवा पीढ़ी का क्षरण होता जा रहा है।<br>मुख्यतः टी.बी. तथा शराब को लेकर लिखा गया यह उपन्यास एक ऐसे व्यक्ति की कहानी को बयां करता है जो शराब बनाकर बेचता है और जरूरतमंद लोगों को कर्जा देकर उन्हें अपने धंधो में शामिल करता है। लेकिन उसके अत्याचारों से परेशान होकर अंत में गाँव की औरतें यह सोचते हुए उसके धंधो को तहस-नहस करती हैं कि अब तक जो हुआ सो हुआ लेकिन अब नहीं।