प्रकृति में सृष्टि का उद्देश्य सूक्ष्म नगण्य अदृश्य अणु परमाणु के जटिल संयोग का विशालतम दृश्य रचना प्राणी मात्र है। सृष्टि रानी ने अवतरण के पूर्व प्राण प्रतिष्ठा समय प्राणी जगत में भाव भावना संवेदना दया करुणा धर्म आस्था कर्म का वृहत आकार ब्रह्माण्ड रूपी भौतिक हृदयी मन मस्तिष्क में बीजारोपण कर दिया है। संचालन कार्य चाहत मनोकामना ईच्छा रूपी अभिलाषा को पालनकर्त्ता ने कर्मप्रधान भोगों पर छोड़ दिया है। किसी की भवना को आघात नहीं करते हुए पुस्तक का नामांकरण अभिलाषा किया हूं। मानस में अभिलाषा असीम ऊर्जा भण्डार है जीवन धारा को गति प्रवाह देता है। विजयी देशभक्ति सेवा वीरों की चाहत होती है। ईच्छाएँ अनन्त है सभी की अभिलाषाएँ विविध हैं पर उपयोगी भाव सर्वश्रेष्ठ है।धर्मपत्नी अनिता पुत्री घनिष्टा गौरांगिका भोमिका तथा पुत्र शिवांश तेजस्वी सहदयी पुत्र मृणाल एवं साहिल कोतकनीकी कार्यों की मदद का अत्मीय प्रशंसा करता हूँ।साहित्यपीड़िया के उच्चाधिकारी मुद्रण प्रकाशन के सदस्यगणों का सादर आभार एवं प्रणाम करता हूं।अभिलाषा काव्य संग्रह को ब्रह्माणीय माता-पिता जगरनाथ करुणा एवं भारत माता के रक्षा शहीदों को समर्पित करता हूँ।आर्शीवादाकांक्षीतारकेशवर प्रसाद तरूणवैशाख शुक्ल सप्तमीविक्रमी संवतः 2081दिनांकः- 14 मई 2024
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