<p>इस पुस्तक को लिखने का कारण यह है कि समाज में मानसिक रोग से पीड़ित लोग जो अपनी महत्वाकांक्षाओं को इस हद तक अपने मन में बिठा लेते हैं कि अपने सारे रिश्ते-नाते बर्बाद कर खुद को दोषी मानते हैं और अपना पूरा जीवन दूसरी आकांक्षाओं में बिता देते हैं भले ही शुरुआत वे महत्वाकांक्षा को दूसरा रास्ता न देकर या उसमें सुधार न करके करते हैं। हर इंसान अपने सपनों को पूरा करना चाहता है लेकिन हम अपनी कुछ गलत महत्वाकांक्षाओं के सपनों को पूरा करने के लिए मंजिल की तलाश में कई ऐसे रास्ते अपनाते हैं हमें नहीं पता होता कि यह रास्ता और मंजिल सही है या गलत। बस...नशे में रहो. मदहोशी में डूबे रहने के कारण हमें अपने सपने पूरे होते नहीं दिखते हम यह अंदाजा भी नहीं लगा पाते कि खुद को नुकसान पहुंचाने या अपने रास्ते या मंजिल से भटक जाने का हमारे प्रियजनों पर क्या प्रभाव पड़ता है या समय का अंदाजा हम नहीं लगा पाते। तब तक वे हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं. हमारी किताब की मुख्य पात्र अभिलाषा के साथ भी यही हुआ उनकी यात्रा में जो लोग स्वेच्छा से उनके साथ शामिल हुए और जिन्हें वह अपने जीवन में शामिल करना चाहती थीं वे सभी अपनी महत्वाकांक्षाओं में इतने डूबे हुए हैं कि अंत में एक रचना कर बैठते हैं। स्वयं के लिए दुविधा. अलग-अलग लड़ाइयाँ लड़ना अच्छी और बुरी दोनों। शायद यह आज के समाज का एक अलग रूप है जो ज्यादातर बड़े शहरों में देखने को मिलता है जिसे हमने डिप्रेशन का नाम दिया है इसीलिए आम भाषा में ऐसे लोग आदतन अपनी जिंदगी से परेशान होने की बात कहते हैं। मुझसे बात मत करो मैं उदास हूँ!</p>