मैं अपनी बात राइनेर मारिया रिल्के की पंक्तियों से शुरू करता हूँ- मैं भी जीवन और कला को अलग-अलग नहीं करना चाहता। और यह बिल्कुल सच है कि जीवन ऐसे गुजरता जाता हैं-गुम हो चुके अनुभवों या क्षतियों के लिए समय प्रधान नहीं करता। यह बात उस व्यक्ति के लिए तो विशेषतया सच है जो कलाकर है। कला का अनुगमन एक जीवन अवधि के लिए बहुत बड़ा बहुत कठिन और बहुत लम्बा रास्ता है। आज तक मैंने अपने लेखन को बस एक ऐसा काम समझा है जो किया जाना है। लिखना-पढ़ना कब मेरे जुनून में बदल गया। और मेरा जुनून कब मेरे पागलपन में बदल गया मुझे पता ही नहीं चला। ‘आधा आदमी’ उपन्यास पूरा हुआ। जैसे लगता है एक सपना पूरा हुआ है। यह उपन्यास मेरे ज़ेहन में मेरी साँसों की तरह हमेशा चलता रहा। वर्षो तक यह मुझे कचोटता रहा। इस बीच मैंने कई कहानियाँ और फिल्मों के लिए पटकथाएँ लिखी। फिल्में भी बनायी। थियेटर भी किया। बीच-बीच में मैं किन्नरों से भी मिलता रहा। उनके बीच सुबह से शाम कब हो जाती मुझे पता ही नहीं चलता। उनकी समस्या पीड़ा उनकी क्रिया-कलाप उनकी भाषा और उनके अन्तरंग जीवन की थाह पाने की कोशिश करता रहा। और रूक-रूक कर मैं ‘आधा आदमी’ लिखता रहा। लिखते-लिखते 17 वर्ष बीत गए। कभी-कभी तो मुझे ऐसा लगता था कि मैं भी उनके बीच का एक हिस्सा हूँ। धीरे-धीरे मेरा मन उनमें रमता गया। और इस कदर रमा कि मुझे उनमें सुकून मिलने लगा। इसी सुकून ने इस उपन्यास की परिकल्पना की। राजेश मलिक
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