मेरी कविताओं का यह तीसरा संकलन है। पूर्ववर्ती संकलनों- इस समय तकय् और कुछ सम कुछ विषम से इसके कुछ विषय नए हैं पर कुछ का केंद्रीय भाव वही है। हाँ भाषा प्रतीक और कहन बदले हैं। कितनी बार भी लिखू और कितने ही विस्तार में लिखू कविता अधूरी लगती है। इसलिए इस संकलन को मैं अधखिले पन्ने नाम दे रहा हूँ। कोई कविता जो आज पूरी हो गई लगती है उसका आज का पड़ाव है। कविता की यात्र निरन्तर है। कल वह फिर अपनी नई यात्रा में रची जाएगी और आगे भी आपसे रू-ब-रू होती रहेगी।