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About The Book
Description
Author
“आज की हिन्दी कविता में ‘लोकरंग’ चमक-दमक के रूप में सायास लाया जा रहा है लेकिन वह ‘लोक’ अनेक बार नकली सजावटी बनावटी और निरे छद्म के रूप में ही सामने आ रहा है। कविता में शब्दों दृश्यों और परिवेश के नाम पर परोसा गया लोक अधिकांशतः समय की माँग तथा ‘काव्यरीति’ या ‘मैनरिज़्म’ के रूप में सामने आ रहा है। लोक के वास्तविक अन्तर्विरोध प्रतिरोध और जीवन संघर्ष तक पहुँचने के लिए लोकजीवन से जुड़ना आवश्यक है लेकिन अधिकांश कवि मध्यवर्गीय हैं शहरों में रहने के कारण लोकजीवन से कटे हुए हैं सुखी हैं और कविता में व्यक्त उनका दुःख व्यापक समाज का दुःख नहीं है लेकिन आज की हिन्दी कविता में बड़ी संख्या में स्त्रियों दलितों और आदिवासियों की उपस्थिति एक आशाजनक परिदृश्य उपस्थित कर रहा है। इनके कारण कविता में हाशिए का समाज प्रवेश पा रहा है और हाशिए के सवाल कविता में उठाये जा रहे हैं।“