डॉ. शुभांगी श्रीवास्तव ने अज्ञेय के यात्रा साहित्य की विशिष्टता को रेखांकित करने का बहुत सुचिंतित परिप्रेक्ष्य लिया है। अज्ञेय की साहित्यिक और सांस्कृतिक उपस्थिति बहुत बड़ी है। स्वयं वे एक गहन जीवनानुभवों से रची हुई शख्सियत लगते रहे हैं। उनके जीवन में यायावरी की भूमिका सबसे बड़ी है। ऐसा लगता है कि जैसे वही उत्स है गति भी और पड़ाव भी वही है। कहते हैं कि जिन्दगी मैदान की तरह होकर ही सार्थक है कि चारों ओर से आती हवाएँ उसे गढ़ रही हों तो अज्ञेय का जीवन ऐसा ही हुआ। उसे ऐसे ही खुले आकाश. उन्मुक्त नम धरती और चारों ओर से आती हवाओं ने गढ़ा और रुह के भीतर आजाद बने रहने का प्रकाश बसा दिया। कई उतार-चढ़ावों से गुजरती जिन्दगी में यह आव कभी नहीं बदली। कसिया ( देवरिया उत्तर प्रदेश) में एक पुरातत्व टेंट में जन्म हुआ। बचपन में ही आँखों के सामने कश्मीर का उदात्त रहस्यमय सौंदर्य था। नौ साल के थे जब पैदल जम्मू से कश्मीर की यात्रा की थी। बचपन के कई साल कश्मीर में बीते और कश्मीरी रुहानियत दिल दिमाग और अवबोध में समा गई थी। दुर्गम अलंघ्य भूधरों से आती चुनौतियाँ थीं और आँखें उस सुंदरता में पक कर बड़ी हो रही थीं। यहीं बन रहा था सौंदर्य बोध नजरिया और लगाव भी । नई कविता के संसार को जीवंत गतिशील और शामिल प्रकृति के अनेक रूप अज्ञेय की कविताओं से मिले। प्रकृति अपने विराट के साथ उनकी -मूल्यचेतना का अंग बनती गई। डॉ. शुभांगी श्रीवास्तव ने इन पहलुओं को विस्तार दिया है। प्रकृति और प्रदेश देश-देशांतर का विस्तृत परिदृश्य और बदलाव जीवन की विविध गतियाँ और सबके भीतर सक्रिय सार्वभौम-सी कलाचेतना का स्पर्श यहाँ दर्ज है। अज्ञेय की यायावरी पर केंद्रित इस किताब ने उनकी यात्राओं और पड़ावों से हमें फिर फिर जोड़ दिया है। *प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी*