"वक्त के साथ बदलाव जरूरी होता है, पत्रकारों की दुनिया इस बदलाव का महसूस कर रही है। हर न्यूज रूम में यह बदलाव नजर आ रहा है। न्यूज रूम के ठेठ देहातीपन पर यह डिजिटल मीडिया अपना लबादा डाल रहा है। न्यूज रूम एडवांस हो रहे हैं। वही जरूरत इस पेशे में रहने वाले और आने वाले लोगों के लिए भी महसूस हो रही है। वक्त के साथ कदमताल मिलाए बगैर पत्रकार जिंदा नहीं रह सकता है, यह आज की सीधी सीख है। अगर इसे पत्रकार समझ रहा है तो उसे प्रिंट, टीवी के साथ डिजिटल मीडिया को खुले दिल के साथ स्वीकार करना होगा। यही स्वीकार्यता उसे अपने पेशे के प्रति गंभीर बनाएगी। डिजिटल की जरूरतों को समझते हुए यह किताब एक प्रयास भर है। जिस डिजिटल को पत्रकारों के सामने एक बड़े हौव्वे की तरह खड़ा किया गया है, वह वैसा नहीं है, जैसा बताया जा रहा है। यह किताब पूरी तरह से यही समझाने की कोशिश भर है। एआई की चुनौतियों के बीच में नौकरी का संकट है, खुद की पहचान का संकट है। आने वाले कल का संकट है, बावजूद इसके इसमें कुछ अच्छी बातें भी हैं। एआई आने वाले कल को उतना भी नहीं बदल पाएगी, जितना इसके समर्थक इसके बारे में भविष्यवाणी करते हैं और इतना नुकसान भी नहीं कर पाएगी, जितना इसके विरोधी इसकी बुराई करते हैं। हां, एक बात पूरी तरह से स्पष्ट है कि एआई भारतीय मीडिया बाजार को पूरी तरह से बदलकर रख देगी। इसमें वही पत्रकार और न्यूज रूम जिंदा रह पाएगा, जो तकनीकी बदलावों को स्वीकार करेगा, उसके साथ आगे बढ़ेगा। उसकी जरूरत के हिसाब से खुद के भीतर बदलाव करेगा और नई चुनौतियों के साथ अपने पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं का भरोसा खुद के ऊपर बनाए रखेगा।"