ओशो में मनुष्य की जो चरम संभावना है वह साकार हो गयी है। मनुष्य में जो बड़े से बड़ा चैतन्य का विस्फोट रूपांतरण या क्रांति संभव है वह उनमें घटित हुई है। इसलिए दुख और संताप अंधकार और मृत्यु की घाटी में पड़ी मनुष्य-जाति को उनसे बहुत-बहुत आशा बंधती है। सौभाग्य से वे ऐसी संकट-भरी और निर्णायक घड़ी में हमारे बीच हैं जब मनुष्यता के सामने दो ही विकल्प हैं: आत्मघात या नयी चेतना में छलांग। और बड़े आनंद एवं उत्सव की ये अलौकिक घड़ियां हैं कि उनका सान्निध्य पाकर लाखों स्वतंत्र चेतनायें उस छलांग की तैयारी में लगी हैं। और उन्हें पाकर आश्वस्त हैं कि हमारा विनाश नहीं हमारा नया जन्म सन्निकट है।