मेरे लिए ऐसी कविताओं का कोई अर्थ नहीं जो आपमें प्रेम पैदा न करें जिनमें नदी-जंगल की चिंताएं न हों जो भविष्य के संभावित ख़तरों की ओर इशारा न करें जो तमाम अन्यायों पर दम साधे चुप बैठी हों जो मासूमियत के पक्ष में खड़ी न हाें। मुझे सदैव लगता है कि क्रूरताओं के विरुद्ध आवाज़ उठाने की जिम्मेवारी कविताओं की भी है। ग़ैर-बराबरी अमानवीय मृत्यु अन्याय युद्ध जैसी हिंसक मनोवृत्तियों पर कविता को मुखर होना ही चाहिए। गांवों मुहल्लों शहरों की बढ़ती उदासी को कविता में तो जगह मिलनी ही चाहिए। कवि के खड़े होने की जगह तय करने की जगह से ही ख़बर मिल जाती है कि उसकी दिशा क्या होगी! वह जनता का कवि है या सत्ताओं के गीत गाने वाला चारण! यूँ एक बार क्रॉफ्रट की समझ विकसित हो जाने पर अब ‘कवि’ हो जाने में कठिनाई ही कहाँ है! -मनोज छाबड़ा