Alakshit Gaurav : Renu
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आंचलिक कथाकार के रूप में ख्याति के विपरीत इस आलोचनात्मक कृति में रेणु में एक वैश्विक रचनाकार का संधान उपलब्ध है। जाहिर है रेणु का महत्त्व इस कृतिकार के लिए वही नहीं है जो अन्य के लिए है। आखिर क्यों? कथाकार रेणु को देखने-परखने का अलग ही अन्दाज है इस पुस्तक में जो मौलिक ही नहीं सर्वथा नवीन भी है। प्रस्तुत कृति पारम्परिक मतों से लेखक की मतभिन्नता तो प्रस्तुत करती ही है अपने औचित्य का सतर्क-सप्रमाण प्रतिपादन भी करती है। अस्तु रेणु के महत्त्व-निर्धारण के लिए अलग नजरिये की गम्भीर प्रस्तावना करती यह आलोचना पुस्तक वैश्विक पाठकों को मिलने वाले साहित्य-रस और विचार-सार का खुलासा भी करती है।‘भाषा की जड़ों को हरियाने वाला रसायन जो उसे जिन्दा रखता है उसे सम्पन्न करता है वह ‘लोक’ का स्रोत है। इस स्रोत की राह दिखाने के लिए हम रेणु के ऋणी हैं।’ हमारे समय की वरिष्ठतम गद्यकार कृष्णा सोबती ने अपने साक्षात्कारों आदि में अनेक बार इस बात का उल्लेख किया है। उन्हें लगता है कि रेणु ने सभ्य भाषाओं और नागरिकताओं के इकहरे वैभव के बीच भारत के उस बहुस्तरीय वाक् को स्थापित किया जो अनेक समयों की अर्थच्छटाओं को सोखकर संतृप्त ध्वनियों में स्थित हुआ है और वास्तव में वही है जो भारत के असली विट और सघन अर्थ-सामर्थ्य का प्रतिनिधित्व करता है।रेणु ने अपने लोक के आनन्द और अवसाद इन्हीं ध्वनियों इन्हीं भंगिमाओं में व्यक्त किये। दुर्भाग्य से देश के किसी और हिस्से से ऐसा साहस करने वाले लेखक न आ सके और सिर्फ यही नहीं रेणु को और उनकी वाक्-भंगिमाओं को समझने वाले लोगों की भी कमी महसूस की गई। परिणाम यह कि उनको बड़ा तो मान लिया गया लेकिन उनका बहुत कुछ ऐसा रह गया जिसे न समझा गया न समझा जा सका।यह पुस्तक रेणु के उसी अलक्षित को लक्षित है। लेखक का कहना है कि ‘इसके पूर्व रेणु पर जो कहा गया है वह तो कहा ही जा चुका है। यह पुस्तक उन सबके अतिरिक्त है उनके खंडन-मंडन में नहीं है. सतह पर की अर्थ-चर्वणा बहुत हो चुकी। रेणु का अलक्षित ही रेणु के गौरव का आधार है।’ अर्थात् वह अर्थ-लोक जो सुशिक्षित भावक के ज्यामितिक भाषा-बोध की पकड़ में आने से या तो रह जाता है या गलत ढंग से पकड़ लिया जाता है। उम्मीद है पढऩे वाले इससे न सिर्फ रेणु को नये सिरे से पढऩे को उत्सुक होंगे बल्कि अपने समय की अस्पष्ट ध्वनियों को सुनने-समझने की सामर्थ्य भी जुटा पाएँगे।
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