“साहित्य में ऐसे बहुत से लेखक-कवि हैं जिनका जनसंघर्ष से दूर-दूर तक वास्ता नहीं। सरप्लस पूँजी से सैर-सपाटे और मौज-मस्ती करते हैं और अपने कमरे में बैठकर मार्क्स की खूब सारी किताबें पढ़कर जनचेतना का मुलम्मा अपने ऊपर चढ़ाते हैं। गोष्ठियों और मंचों पर खूब भाषण देते हैं। भारतवर्ष में ऐसे नवबुर्जुआ लोकवादियों की कमी नहीं। ये मार्क्सवाद और लोकचेतना का चोला पहनकर अपनी गलत कमाई को सफेद करना चाहते हैं। अपने पक्ष में एक माहौल बनाना चाहते हैं। ये पूँजीपतियों और सामन्तों से कम खतरनाक नहीं हैं। इनका एक प्रमुख अभिलक्षण यह भी है कि ये केवल सत्ता का विरोध करते हैं शोषक समाज का नहीं क्योंकि यह उनके ही अंग होते हैं। लोकचेतना और वर्गसंघर्ष उनका मुखौटा है। उनका ‘डी-क्लासीफिकेशन’ एक छलावा है इसलिए हमारी लड़ाई केवल सता और पूँजी से नहीं इन तथाकथित सफेदपोशों से भी है जो अपने को वर्गविहीन कहकर हमें ठगते हैं।“