चार इमली उपन्यास एक सामाजिक पहलू की अंतर्दशा का बोध करता है i ऊँचे पदों पर बैठे लोग बाहरी आवरण से भद्र दिखते हैं पर उनकी कार्यशैली की कुरूपता वे स्वयं अनायास व्यक्त कर देते है i चाहे प्रशासनिक क्षेत्र हो चाहे चिकिसकीय क्षेत्र न्यायालयीन क्षेत्र या शैक्षणिक क्षेत्र उन क्षेत्रों में पदासीन व्यक्ति अन्यों से सब अपेक्षायें रखते हैं पर स्वयं खोखली नीँव पर अपना अस्तित्व बनाते हैं i प्रयास चिंतनीय व् सोचनीय है i अनुकरणीय कदापि नहीँ i शासन / प्रशासन के वे राज़ जो उजागर नहीँ हो पाते हैं वे चार इमली (जो वास्तव में भोपाल का प्रशासनिक रहवासी क्षेत्र है) में उजागर हुए हैं i