इस पुस्तक में मैंने विभिन्न समय पर लिऽे लेऽों को लिया है। यह लेऽ इधर उधर पत्र-पत्रिकाओं में संकलित थे। इनको एक स्थान पर लाने के लिए मैंने इन्हें पुस्तकीय रूप देने का प्रयास किया है। वास्तव में मैं कहानीकार हूं उपन्यासकार हूं विभिन्न प्रकार के विचार दिमाग में उमड़ते रहते हैं जिसका परिणाम यह लेऽ हैं। पाठकों की प्रतिक्रिया के बिना सारा प्रयास व्यर्थ सा ही रहता है। इसलिए आपकी प्रतिक्रिया वांछित रहेगी। शेष जो रह गए उन्हें भाग दो में एकत्रित कर प्रकाशन करने की योजना भी तो है। - गंगा राम राजी