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About The Book
Description
Author
संग्रह की कहानियाँ एक ऐसे मनोवैज्ञानिक काल की ओर ले जाती हैं जहाँ पात्र अपने क्रिया-कलापों के माध्यम से पाठक को सजग और चैतन्य रखता है जिससे वह कहानीकार की संवेदना का अविच्छिन्न अंग बनता चलता है; आकर्षण प्रेम खिंचाव की संवेदना से अलग अनुभवों की ओर हमारी उँगली पकड़कर ले चलती हैं जहाँ गरीबी और घर के बंटवारे की लाचारी से जूझता आदमी है जिसकी दस्तक और पुकार-गुहार बरसते पानी में लौट-लौटकर उसी तक लौट आती है क्योंकि दूसरे पक्ष की संवेदना कुंद है। भूख और एड्स से जूझता युवा है जो स्वाभिमान और सुधा- दोनों में से किसका चुनाव करे समझ नहीं पाता। अंततः जीतती है सुधा- जो सारे होशो-हवास को पस्त कर डालती है। भूख बीमारी बेरोजगारी और अभाव के अनन्त शेड्स इन कहानियों में बिखरे हुए हैं। ये शेड्स इन कहानियों को यथार्थ की दुनिया से परे की चीज़ बनाते हुए वस्तुनिष्ठ रूप देने में सक्षम होते हैं। कहानी का रचनाकार शब्दों में अलग ही कालखंड तैयार कर लेता है जिसमें प्रेमिका को सच पता चलने का डर है भूख के अतिरेक में अकेली वृद्धा की तवे पर सिंकती कच्ची-पक्की रोटियों पर अपने टूट पड़ने का डर है। ये कहानियाँ अपने एक तयशुदा पैटर्न में नहीं लिखी गई हैं बल्कि तयशुदा पैटर्न को बेंधकर अभाव असमानता रोग मृत्यु के भय से आक्रांत मन की विभिन्न व्याकुलताओं का कोलाज़ हैं।