*COD & Shipping Charges may apply on certain items.
Review final details at checkout.
About The Book
Description
Author
अंधेरे के खिलाफ- एक तीव्र संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना से युक्त समकालीन हिंदी काव्य-संग्रह है जो कविता के माध्यम से समय सत्ता समाज और संस्कृति की परतों को बेधता है। यह पुस्तक मणिपुर की उन पीड़ित नारियों को समर्पित है जो ‘तंत्र की नंगई’ और ‘समाज के अंधेपन’ का शिकार बनीं। इस संग्रह की कविताएँ व्यवस्था के छलावे न्याय की खोखली अवधारणा आधुनिक लोकतंत्र की विडंबनाओं और आम आदमी के संघर्ष को निर्भीक शब्दों में व्यक्त करती हैं। ‘धर्मराज्य’ ‘स्वर्ग-नर्क’ ‘सभ्यता की बेटी नैतिकता’ ‘विकल्पहीनता’ ‘लोकतंत्र में सत्ता’ और ‘घर: एक अवैध शब्द’ जैसी कविताएँ पाठक को झकझोर देती हैं। लेखक मानवीय करुणा और ऐतिहासिक स्मृति के साथ पाठकों को उन सवालों से रूबरू कराते हैं जिन्हें अक्सर इतिहास और सत्ता द्वारा अनदेखा कर दिया जाता है। व्यास से पूछे गए प्रश्न बुनकरों और किसानों की उपेक्षा और ‘इन्द्रलोक के अपराधी’ जैसे शीर्षक सत्ता की निर्ममता और साहित्यिक मौन पर गहरी चोट करते हैं। इस संग्रह की भाषा सरल सहज किन्तु बेहद प्रभावशाली है जहाँ कविता केवल भाव नहीं बल्कि प्रतिरोध और प्रतिपक्ष की भूमिका निभाती है। कवि स्वयं को ‘कवि’ कहने से इंकार करता है और खुद को एक प्रश्न एक दरार एक गंध एक अस्वीकार मानता है - जो अंधेरे में रोशनी की लौ खोजता है। एक काव्य-आक्रोश है - व्यवस्था धर्म पूंजीवाद और युद्ध के विरुद्ध और साथ ही एक करुणामयी आग्रह - लौटने का पुनः मानव होने का। यह संग्रह आज के हिंदी साहित्य में एक जरूरी और मौलिक हस्तक्षेप है जो कविता को केवल सौंदर्य नहीं बल्कि साहस और सत्य का माध्यम बनाता है।