असली कहानी वह नहीं होती जो किसी अंत पर ठहर जाती है। असली कहानी वह होती है जो अंत के बाद भी पाठक के भीतर उमड़ती-घुमड़ती रहती है। दरअसल लगभग सारी कहानियां तभी जीवन की कहानियां हो पाती हैं जब वे चलती रहती हैं। उनका अंत एक नये प्रस्थान बिन्दु की तरह आता है। अर्चना सिन्हा के संग्रह की कहानियां शीर्षक के अनुरूप न खत्म होने वाली यात्रएं हैं - जीवन के बहुत सारे आयतनों को समेटने वाली रिश्तों में लगातार बने रहने वाले द्वंद्व की गुत्थियों को खोलने की कोशिश करनेवाली और इस क्रम में जीवन के नये आयामों को खोजने वाली। ‘अंत के बाद’ की चर्चा में ऐसे प्रत्ययों के विस्तार में जाना जरूरी नहीं। अर्चना सिन्हा की कहानियां अपने आयतन में जितनी जगह समेटती रही हैं और उस फैलाव में रिश्तों का सफर जितनी अप्रत्याशित करवटें बदलता हुआ दिखता रहा है उनसे कहानीपन की पुरानी अवधारणा में नये अध्याय जुड़ते हैं। लेकिन यहां इस संग्रह में उस रचनात्मक वैशिष्टड्ढ का दुहराव नहीं है। तो भी अविराम इंटरएक्शन के गहरे मनोमंथन से जन्मी ये कहानियां जिस सहज रोचकता के साथ अपना स्थापत्य गढ़ती हैं वह अपूर्व नहीं होने के बावजूद असरदार कलम की एक और बानगी पेश करती हैं। आप इन्हें देखें और पढ़ें। इस आमंत्रण के साथ यह संग्रह आपके हवाले है। - विद्याभूषण