जब से कविता है तब से यह प्रश्न है कि कविता का सम्बन्ध हृदय से है या मस्तिष्क से भाव से है या विचार से कवि से है या संसार से। मैं तो कभी इस गुत्थी में उलझी ही नहीं। इस चक्रव्यूह में फंसी ही नहीं। मैं तो बस यह मानती हूं और अनुभव भी करती हूं कि कविता लिखना ऐसा ही है जैसे आत्मकथा लिखना। अधिकतर लोग तो यही मानते हैं कि कविता लिखना आत्मव्यथा लिखना है। अब मैं क्या करूं। मेरे मन में बहुत अधिक व्यथाएं आती ही नहीं। मेरे मन में तो एक ही विचार बार-बार आता है-<br>जब तक जिन्दा हैं तब तक तो ज़िन्दा हैं<br>आगे की फिर आगे देखेंगे।