“अनुरंजनी”हमारे देश भारत में सभ्यता संस्कृति और साहित्य का बेजोड़ समन्वय रहा है। इसी के साथ धर्म रीति-रिवाज़ सामाजिक सांस्कृतिक समायोजन के साथ कर्म का भी प्रत्यक्ष और सापेक्ष रूप यहाँ देखने को मिलता है। इन्हीं के चलते सामाजिक परिवेश का एक समुन्नत मिश्रण का योग बना जिसकी बदौलत यहाँ पर जैन बौद्ध और सनातन पद्धतियों की ऊँची वैचारिकी और चिंतन का समावेश हुआ। साधु-संत समाज सुधारकों विद्वानों मनीषियों और योगियों की तो ये तपोभूमि रही है। यहाँ पर अध्यात्म और जीवन दर्शन की भी ऊँची विरासत रही है जिसके कारण हम किसी ऐसी अद्भुत अदृश्य शक्ति के प्रति नतमस्तक हुए जो हम सबके कल्याण में सदैव हमारी मार्गदर्शक बनी रहती है। उनके कारण हमारी आस्थाओं व्यवस्थाओं और सामाजिक परिदृश्य में रहन-सहन सामाजिक रिश्ते आपसी संबंध जरूरतों और आनंद के साधनों का निर्माण किया गया। आनंद की ही तलाश में हमारे दुखों का भी जन्म हुआ। यह दुख और सुख ही हमारे व्यक्तित्व और सामाजिक जीवन का एक गुंथा हुआ संजाल बना हुआ है। इसी के इर्द-गिर्द ही हमारा पूरा जीवन चक्र चलता आया है।इसी मानवीय जीवन चक्र के पीछे छुपे कारणों को कविताओं के माध्यम से यह पुस्तक प्रश्न उठाती हुई उनके उत्तर तलाश करने का प्रयास करती नजर आती है। इन प्रयासों में कुछ खट्टे-मीठे रोचक मनोरंजक और आनंदित करने वाले प्रसंगों का योजन किया गया है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि 'अनुरंजनी' नाम की यह पुस्तक हर उम्र के पाठक में रुचि पैदा कर उनके अन्तःकरण को मुदित करने का भरसक प्रयास करेगी। धन्यवाद! सूबे. मेजर श्रीनिवास ताड़ियान ‘मनोहर’ (सेवानिवृत्त)