अपराजिता समर्पित है उन सभी स्त्रियों को जो नियति के प्रहारों से आगे हैं जो कभी हार नहीं मानती। ये कविताएं एक युवा होती स्त्री के अंतरद्वंदो का दर्पण हैं जिसे प्रायः पुरुष समाज अति सामाजिक होने के कारण देख नहीं पाता। इन कविताओं में मैं नहीं तुम ही मिलोगी खुद से! तुम जो जग के विस्तृत फलक पर एक बिंदु मात्र नहीं वह कलम हो जिससे चरित्र गढ़े गए संस्कृतियां गढ़ी गईं।तुम जो कभी भावुक कभी भीरू कह दी जाती हो तुम जो कभी समुद्र में उठती संशय की लहर हो तो कभी विश्वास का किनारा।तुम जो निरंतर संघर्षरत हो अपनी अस्मिता बनाने के लिए।तुम जो निर्णय लेती हो फिसलती हो गिरती हो उठती हो संभलती हो फिर चलती होलेकिन कभी हार नहीं मानती।तुम ही हो अपराजिता!