1980 के बाद का पूर्वी भारतीय शहर। जनवरी की भीगी सुबह और एक शवयात्रा से शुरू होती विधि की कथा—एक ऐसी युवती की जिसके जीवन में अभाव परिवार की टूटती परछाइयाँ और छोटे भाई सोम की ज़िम्मेदारी साथ-साथ चलती है। स्कूल की नौकरी से लेकर अचानक घर छोड़ देने तक काशी की गलियों से राजधानी और फिर बेंगलुरु तक की लंबी यात्रा में वह प्रेम भरोसे संबंधों और रिसते हुए अकेलेपन के अर्थ तलाशती है।<p>यह उन युवाओं की भी कहानी है जो छोटे क़स्बों से मेहनत पढ़ाई और संयोग के सहारे बड़े शहरों तक पहुँचते हैं—जहाँ पार्क झीलें ऑफ़िस प्रेशर प्रमोशन की राजनीति लिव-इन रिश्ते टूटन डिप्रेशन और नशा—सब साथ चलते हैं।</p><p>लेकिन यह सिर्फ़ प्रेम या संघर्ष का वृत्तांत नहीं। यह एक स्त्री की अपने भीतर की यात्रा है—खुद को समझने स्वीकार करने और जीवित रहने की वजह खोजने की कोशिश। आख़िर आशा—‘होप’—वह कहाँ पाती है? </p>