स्त्री जीवन के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष संघर्षों को अनेक लेखकों ने अपनी गहन रचनाओं में उकेरा है। मगर पूनम पूर्णाश्री का उद्देश्य स्त्रियों की साधारण-सी दिखने वाली दिनचर्या में होने वाली जद्दोजहद को उभारना है। बचपन से जवानी की जटिलता एवं स्त्रियों के कार्यक्षेत्र में व्याप्त संघर्ष ही इस किताब का आधार है। ‘अथ स्त्री उवाच’ की हर कहानी अपने आप में एक विचार है। स्वयं स्त्रियों को भी कहाँ मालूम होगा कि एक छोटे से शब्द लिंगभेद के कारण उनकी जन्मजात असमानता की रात कभी समानता की बेला में परिवर्तित हो पाएगी? विडंबना यह भी है कि इस असमानता को नकार देने वाले समाज के साथ स्वयं स्त्रियाँ भी इसकी हिमायती हैं।
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