यह पुस्तक ईस्ट इंडिया कंपनी के आरंभिक दिनों के एक कलक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड के जीवन पर आधारित है जिसने अपने सुधारों के माध्यम से राजमहल के जंगलतरी इलाके में रहने वाले पहाड़िया आदिम जनजाति को शांतिपूर्ण जीवन जीने की कला सिखाई थी। क्लीवलैंड 18वीं सदी के अंत में वर्तमान बिहार के भागलपुर और झारखण्ड राज्य के राजमहल का कलक्टर हुआ करता था जिसकी नियुक्ति गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने की थी। बंगाल के पतन के बाद जब यह इलाका पूर्ण रूप से अंधकार में डूबा हुआ था और लोग एक दूसरे की हत्याएं कर रहे थे तब क्लीवलैंड शांतिपूर्ण तरीके से अपनी सुधारवादी नीतियों के साथ आगे बढ़ा। उसने पहाड़िया जनजाति जो हमेशा स्वतंत्र रहा करते थे के खिलाफ तोप के एक गोले को दागे बिना ही शांतिपूर्ण तरीके से उन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में शामिल कर लिया। अपनी बनाई गई हिल योजना के तहत क्लीवलैंड ने जो मेहनत की उसका परिणाम यह हुआ कि वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गया और उसकी मृत्यु महज 29 साल की उम्र में हो गई। पहाड़िया लोग प्यार से उसे चिलीमिली साहब कहकर पुकारते थे। उसकी बनाई गई योजनाएं इन इलाकों में आज भी कारगर हैं। इस पुस्तक को एक उपन्यास के रूप में लिखा गया है।