वीना उदय की इन कहानियों में मध्यवर्गीय स्त्रियों के संसार की सीमित चौहद्दी के दायरे में घटित होने वाली वही बहुश्रुत बहुपठित त्रासदियों का ऐसा जीवंत और कल्पनापूर्ण चित्रण है कि सहज ही करुणा से हृदय आप्लावित हो उठता है। बिना लंबी भूमिकाओं और अनावश्यक विवरणों के नपे-तुले शब्दों में जीवन की कठोर सच्चाईयों से रूबरू कराना लेखकीय कौशल है। भाषा प्रवाहपूर्ण और खाँटी है। कथ्य के चयन में भले ही कुछ असाधारण और विशिष्ट न हो परंतु उसका ताना-बाना विदग्धता से बुना गया है। इससे आश्वस्ति होती है कि जब वे घर-गृहस्थी मध्यवर्गीय रूढ़ियों और स्त्री होने की विडम्बना आदि के घेरे से बाहर जाकर यथार्थ को समग्रता से देखने और एकदम अछूते कथ्य और तीखे तेवर लेकर लेखन करेंगी तो बहुत सी अच्छी कहानियाँ सामने आएँगी। यह किसी भी कथाकार की निर्मिति की अनिवारी प्रक्रिया है। इस संकलन में ‘और तुम आसमानी हो गईं’ और ‘अपना मकान’ जैसी कहानियां ऐसी ही संभावना की ओर इंगित करती हैं। : “राजेन्द्र राव”