बाघ एवं अन्य कहानियाँ प्रकाशित होते समय इसमें वर्णित घटनाएँ एवं कहानियों में चित्रित चरित्र मेरी स्मृति में उभरने लगे। अपने देश के विभिन्न गाँव और शहरों में उनसे मेरी भेंट हुई मैंने उनकी हालत देखी। हर एक चरित्र ने मुझे ऐसा आन्दोलित किया कि उनके बारे में लिख चुकने तक अपनी छाती के अन्दर मैंने घुटन-सा महसूस किया। ये सारी कहानियाँ उन चरित्रों की हैं। किसी ने बड़े हल्के ढंग से कहा था कि प्रत्येक लेखक एक-एक जेबकतरा है। जेबकतरों के पास अपना कोई खास संसाधन नहीं होता दूसरों से चुरा कर उनके रईस बनने की तरह लेखक लोग भी दूसरों की कहानी को आधारित कर कहानी-उपन्यास लिखते हैं। कुछ हद तक यह सच है क्योंकि लेखक खुद के अलावा दूसरों के अनुभवों से भी उनकी कथा संग्रह कर लेता है। लेकिन कहानी रचने के लिए सिर्फ तथ्य या अनुभव ही पर्याप्त नहीं है। उन सबको लेखक अपने में समेट लिए विना पाठकों की विश्वसनीयता हासिल नहीं कर सकता। वैसी कहानी पढ़ने पर पाठकों को लगेगा जैसे लेखक ने आसमान से तोड़ लाने की तरह एक अयथार्थ कहानी लिखी हो। अतः कहा जाता है कि कहानी पढ़ते समय अगर वह कहानी लगती है तो वह असफल है। लेकिन पाठक जब उसे सच्ची घटना मानकर पढ़ते हैं तब उसे सफल कहानी मानना होगा।: गौरहरि दास