बाल कहानियों में सबसे बड़ा तत्व मनोरंजन का होता है। किंतु यदि मनोरंजन के साथ-साथ कहानी के माध्यम से कोई शिक्षा या संदेश भी बच्चों तक संप्रेषित हो जाए तो कहानी सार्थक हो जाती है। किंतु यह शिक्षा या संदेश बिलकुल अप्रत्यक्ष रूप से होनी चाहिए इस तरह कि ग्रहण करने वाले को आभास भी न हो सके कि उसे न हो सके कि उसे कुछ सिखलाया जा रहा है। शिक्षा के लिए तो स्कूल की किताबें होती ही हैं यदि कहानियों में भी शिक्षा दिखाई पड़ने लगे तो बच्चे उनकी ओर आकर्षित होने के बजाय उनसे दूर भागेंगे।