About the Book: इस पुस्तक को इस रूप में प्रस्तुत करने का कारण व्यावहारिक तथा मनोवैज्ञानिक है। आज के डिजिटल युग में बच्चों का वास्तविक जगत से परिचय आवश्यक है। अतः विभिन्न प्रकार के छोटे-बडे तथा जड़ चेतन अवयवों से सहज रूप में उनका जुड़ाव हमारा उद्देय हैं किसी भी अवयव से जुड़ने और उसे याद रखने में कान आँख व जुबान मस्तिष्क की मदद करते है जहाँ कविता पढ़ने में जुबान तथा कान की मदद मिलती है चित्र देखने से मस्तिष्क को आँख की मदद भी मिलने लगती है चित्र अवचेतन मन पर स्थायी प्रभाव छोडते हैं उनमें रंग भरने की प्रक्रिया उस अवयव के प्रति बच्चे की समक्ष को विकसित करती है। इस प्रकार पुस्तक समग्रता के साथ बच्चों को वातावरण से जोडने के उदेय पूरा करती है मुझे विश्वाश है कि पुस्तक अपने उद्देय पूरा को प्राप्त करेगी।About the Author: जीवन में हर ओर रंग बिखरे हुए हैं। हमारी प्रकृति संस्कृति वस्तुओं संबंधों मौसम त्यौहारों के साथ साथ सात सुरों के भी अपने रंग हैं। ये रंग हम अपनी संवेदनशीलता से महसूस करते हैं। जन्म के साथ ही बाल मन पर जीवन के यह रंग अनायास अपनी पैठ बना लेते हैं। जिनमें कुछ रंग माँ के आंचल से तो. कुछ पिता के कंधों पर चढ़कर दुनिया देखते हुए नौनिहालों की जिज्ञासा बढ़ाते हैं। नन्ही आंखों से इनके चेतन और अवचेतन मन पर इंद्रधनुषी प्रभाव पड़ता है। छोटी बड़ी वस्तुएं. संबंध उनकी कोमल भावनाओं में कौतूहल जागते हैं। जिनसे उनके हृदय में इन्हें जानने के लिए आचार्य के मिले जुले भाव जागृत होते हैं।
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