बात है मुख्तसर सी... बात है तो मुख़्तसर सी ही होनी चाहिए क्योंकि यदि बड़ी हो जाएगी तो बतंगड़ न बन जाएगी। अतः इस काव्य संग्रह में लगभग एक सौ तीस कविताएं हैं। प्रस्तुत पुस्तक में कई विषयों पर कविताएं हैं चाहे प्रकृति सौंदर्य हो मातृ महिमा हो स्त्री विमर्श हो परिवार समाज हो प्रेम विरह हो जीवन दर्शन हो आदि आदि जैसे कई प्रासंगिक विषयों पर ज्वलंत कविताएं हैं। इतना ही नहीं इस काव्य संग्रह में गीत ग़ज़ल नज्म शेर आदि भी संकलित हैं। इसके अतिरिक्त कुछ अंग्रेजी कविताओं और कुछ कोट्स को भी पुस्तक में स्थान दिया गया है। मेरा मानना है कि हर पाठक को इसमें अपने लिए कुछ ना कुछ अवश्य मिल जाएगा।